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50 रुपये कमाने वाला गरीब किसान का बेटा, आज है 3300 करोड़ के इस नामचीन ब्रांड का मालिक

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कहते हैं, “हिम्मते मददे खुदा” मतलब कि दिल में अगर कुछ करने का जूनून हो या यु कहे कि अगर सच्ची हीममत हो तो सपने पुरे करने में खुदा भी आपकी मदद करता है. जी हाँ, इसी कहावत को सच करने का हुनर रखने वाले डॉ. वेलुमनी अरोक्यास्वामी एक ऐसा नाम है, जो शायद की किसी पहचान का मोहताज़ हो.

डॉ. वेलुमनी अरोक्यास्वामी, वो नाम है जो कभी अपने बचपन में दो वक़्त के खाने के भी मुहताज थे. पर आज वो एक जानेमाने वैज्ञानिक और एक कुशल उद्योगपति हैं. Thairocare टेक्नोलॉजी लिमिटेड के मालिक डॉ. वेलुमनी की कुल सम्पति आज करोड़ो में है और वे आज भारत कुशल उद्योगपति में एक माने जाते हैं.

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एक कुशल उद्योगपति के साथ साथ Medical Diagnostic, Thyroid Testing, Analytical Biochemistry, Nuclear Medicine के छेत्र में भी इनका नाम बड़े गर्व से लिया जाता है. लेकिन क्या आपको पता है कि डॉ. वेलुमनी ने फर्श से अर्श तक का ये सफ़र कैसे हांसिल किया? चलिए हम आपको उनकी मेहनत की कहानी बताते हैं कि कैसे उन्होंने अपने सपनों को साकार किया और विश्व स्तर पर अपना नाम कमाया.

दरअसल थायराइड डिसऑर्डर से जुड़े टेस्ट के लिए एक जाना-पहचाना नाम है थायरोकेयर। इसके संस्थापक डॉ. अरोकियास्वामी वेलुमणि को एक जमाने में यह भी मालूम नहीं था कि थायराइड ग्रंथि शरीर में होती कहां है। फिर उन्होंने थायराइड बायोकैमिस्ट्री में पीएचडी की।

यूँ तो डॉ. वेलुमनी अरोक्यास्वामी का जन्म 1959 में कोयम्बतूर , तमिलनाडु के एक बहुत ही गरीब मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था. घर में चार बच्च, पत्नी, माता पिता के साथ बहुत ही मुश्किल के साथ इनका गुजरा हुआ करता था। इनके पिता बहुत पहले ही घर जी जिम्मेदारियों से अपना हाथ धो बैठे थे और जिम्मा इनके माता के सर आ गया। माता ने दो भैंसों के सहारे 10 सालों तक पुरे परिवार का भरण पोषण संभाला।

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हफ्ते भर में 50 रुपये की कमाई के साथ बड़ी कठिनता से परिवार का निर्वहन किया। पढाई की खातिर डॉ. वेलुमनी ने घर और परिवार को बहुत पहले ही त्याग कर दिया, और मात्र 19 साल की उम्र में अपनी स्नातक की पढाई मिशन विद्यालय कोयम्बतूर से पूरी की. स्नातक की पढाई पूरी होने के बाद उन्हें घर की समस्या और नौकरी की चिंता होने लगी जो कि स्वाभाविक था।

वक़्त ऐसा था कि साधारण से साधारण नौकरी के लिए अंग्रेजी भाषा की काफी जरूरी थी। किसी तरह उन्होंने कोयम्बतूर के ही एक कंपनी में एक कैमिस्ट के तौर पर काम करना शुरू किया और महीने के महज़ 150 रुपये तनख्वाह से शुरुआत हुई। 150 रुपये की तनख्वाह में वो 100 रुपये अपने घर भेज दिया करते थे क्योंकि उन्हें अपनी घर की हालत और माँ की परिस्थिति अच्छी तरह से याद थी. काम करने के दौरान ही उन्होंने अपनी मास्टर की डिग्री पूरी की.

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14 साल नौकरी करने के बाद 37 की उम्र में उन्‍होंने इसे छोड़ने का मन बना लिया. थायरॉयड बायोकेमिस्‍ट्री में अपनी विशेषज्ञता को आधार बनाकर उन्‍होंने टेस्टिंग लैब स्‍थापित करने की ठानी। समय के साथ उन्होंने बच्चों को tution देना शुरू किया और 800 रुपये की अतिरिक्त आमदनी कमाया।

ये सब कुछ 15 सालों तक चला जिसके बाद वेलुमनी ने अपनी पीएचडी की डिग्री पूरी कर ली। अब वो डॉ. वेलुमनी हो गए थे।अपने पीएचडी के दौरान इन्हें समझ आ गया था कि थायरॉइड के फील्ड में टेस्ट करके लोग बहुत पैसे कमा रहे हैं तो फिर मैं क्यों नहीं कमा सकता. 

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1955 उन्होंने अपने काम से स्तीफा दे दिया और कुछ जमा किये पैसों से थिरोइड की टेस्टिंग लैब का निर्माण मुबई में किया. समय के साथ अपने कार्यों में और कुशलता हाशिल किये और सन 2011 में नई दिल्ली की कंपनी सीएक्स-पार्टनर्स ने थायरोकेयर में 30% स्टेक खरीद लिया। जिसकी कीमत तकरीबन 188 करोड़ रुपए और कंपनी की पूरी वैल्यू बनी 600 करोड़ रुपए थी |

स्थिति और भी अच्छी होती गई और आज उनकी कंपनी की कुल किम्मत अरबों में मापी जाती है. उनकी जीवनी से बहुत कुछ सिखने को मिलता है कि कैसे एक इन्सान महज 50 रुपये से जिंदगी की शुरुआत किया और आज अरबों रुपये का मालिक है.

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