विवाह के लिए श्रीराम ने तोड़ा था भगवान शंकर का धनुष, जिसे 5 हजार लोग खींचकर लाए थे

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मार्गशीर्ष महीने के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि पर श्रवण नक्षत्र में त्रेतायुग में श्रीराम और सीता का विवाह हुआ था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस तिथि को विवाह पंचमी भी कहा जाता है। तुलसीदास रामायण में, पुष्प वाटिका राम-सीता मिलन और धनुष (पिनाक) तोड़ स्वयंवर सहित प्रभु विवाह का अद्भुत वर्णन उल्लेखनीय है। तुलसीदास जी ने बड़े ही अद्भुत ढंग से जनक नंदनी और श्री राम मिलन प्रशंग को दर्शाया है। वंही वाल्मीकि रामायण में राम-सीता विवाह के एक अलग ही दर्शन प्राप्त होते है।

सीता का विवाह स्वयंवर पद्धति से नहीं हुआ था। महर्षि वाल्मीकि की रामायण में केवल इस बात का उल्लेख है कि सीता के पिता जनक ने यह घोषणा की थी कि जो कोई शिव धनुष पर बाण का संधान कर लेगा, उसके साथ सीता का विवाह कर दिया जाएगा। समय-समय पर कई राजा आए, किंतु धनुष को कोई हिला भी नहीं सका। रामायण के बालकांड के 67 वें सर्ग के अनुसार मुनि विश्वामित्र भी राम-लक्ष्मण को लेकर जनकपुर गए और जनक से राम को धनुष दिखाने को कहा।

धनुष के आकार को देखकर ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि कोई भी राजा धनुष को हिला भी क्यों नहीं पाया था? रामायण के अनुसार यह धनुष एक विशालकाय लोहे के संदूक में रखा हुआ था। इस संदूक में आठ बड़े-बड़े पहिये लगे हुए थे। उसे पांच हजार मनुष्य किसी तरह ठेलकर लाए थे। इस धनुष का नाम पिनाक था। श्रीराम ने संदूक खोलकर धनुष को देखा और उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दी । प्रत्यंचा चढ़ाकर श्रीराम ने जैसे ही धनुष को कान तक खींचा, वैसे ही वह बीच में से टूट गया।

रामचरित मानस में सीता-राम विवाह:-

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें।
काहुं न लखा देख सबु ठाढ़ें ।
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा।
भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ।।

तुलसीदास जी कहते हैं कि राम ने धनुष कब उठाया, कब चढ़ाया और कब खींचा, तीनों काम इतनी फुर्ती से किए कि किसी को पता ही नहीं लगा। सबने राम को धनुष खींचे खड़े देखा। उसी क्षण राम ने धनुष को बीच से तोड़ डाला। भयंकर कठोर ध्वनि सब लोकों में छा गई।

श्रीराम ने तोड़ा था भगवान शंकर का पिनाक धनुष

भगवान श्रीराम ने माता सीता को धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा कर वरण किया था। वास्तव में वह भगवान भोलेनाथ का धनुष था जिसकी टंकार (धनुष की रस्सी को खींचने के बाद अचानक छोड़ देने वाली आवाज) से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। इसी धनुष के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को भगवान शंकर ने ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था।

शिवधनुष उत्पत्ति

पिनाक भगवान शिव का मूल धनुष है जो विनाश या “प्रलय” के लिए उपयोग किया जाना है। मूल वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा द्वारा समान क्षमता के दो धनुष बनाए गए थे जो उन्होने रुद्र (भगवान शिव) और भगवान विष्णु को दे दिए और उनसे यह अनुरोध किया कि दोनों आपस में युद्ध करें जिससे ज्ञात हो सके कि उनमें से शक्तिशाली कौन है।

लेकिन युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले आकाशवाणी हुई कि यह युद्ध विनाश का कारण बन जाएगा और इसलिए यह युद्ध रोक दिया गया था। आकाशवाणी होने पर रुद्र ने धनुष फेंक दिया जो पृथ्वी पर गिर गया जिसे बाद में “शिवधनुष” कहा गया। पृथ्वी पर यह धनुष राजा जनक के पूर्वज राजा देवरथ को मिला। हिंदू महाकाव्य रामायण में इसका उल्लेख है, जब श्री राम इसे जनक की पुत्री सीता को अपनी पत्नी के रूप में जीतने के लिए भंग करते हैं।

शिव पुराण कथा प्रशंग

भगवान विश्वकर्मा ने दो दैवीय धनुष तैयार किए। जिनमें एक का नाम शारंग तथा दूसरे का नाम पिनाक था। उन्होंने शारंग भगवान विष्णु को तथा पिनाक भगवान शिव को दिया था। शिव पुराण में भगवान शंकर के इस धनुष का विस्तृत उल्लेख मिलता है। जब राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान शंकर बहुत क्रोधित हो गए तो उन्होंने सभी देवताओं को अपने धनुष (पिनाक) से नष्ट करने की ठानी। एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया। बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया।

देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवरात को यह धनुष दिया था। राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवरात थे। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। इस धनुष को भगवान शंकर ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था। उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था। लेकिन एक दिन उनकी पुत्री सीता ने खेल -खेल में वह धनुष उठाकर रख दिया।

इस घटना को जनक ने देखा और उन्होंने सीता के स्वयंवर के लिए इस घटना को पृष्ठभूमि के रूप में बनाने का फैसला किया। बाद में, जनक ने घोषणा की कि जो भी सीता से विवाह करना चाहता है उसे इस दिव्य धनुष उठाना होगा और इसकी प्रत्यंचा चढ़ानी होगी। अयोध्या के राजकुमार राम ने ही यह धनुष प्रत्यंचित किया और सीता से विवाह किया। विवाह के बाद जब उनके पिता दशरथ राम के साथ अयोध्या लौट रहे थे, परशुराम ने उनके मार्ग को रोका और अपने गुरु शिव के धनुष को तोड़ने के लिए राम को चुनौती दी।

राम ने धनुष को भंग कर दिया । इस पर दशरथ ने ऋषि परशुराम से उसे क्षमा करने के लिए प्रार्थना की लेकिन परशुराम और भी क्रोधित हुए और उन्होने विष्णु के धनुष शारंग को लिया और राम से धनुष को बांधने और उसके साथ एक द्वंद्वयुद्ध लड़ने के लिए कहा। राम ने विष्णु के धनुष शारंग को लिया, इसे बाँधा, इसमें एक बाण लगाया और उस बाण को परशुराम की ओर इंगित किया। तब राम ने परशुराम से पूछा कि वह तीर का लक्ष्य क्या देंगे। इस पर, परशुराम स्वयं को अपनी रहस्यमय ऊर्जा से रहित मानते हैं। वह महसूस करते हैं कि राम विष्णु का ही अवतार है।

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