जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस से बाहर निकाल दिया गया! पढ़िए पूरा किस्सा

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कांग्रेस पार्टी के राजनीतिक इतिहास में हर दिन का अपना अलग महत्व है, लेकिन कांग्रेस पार्टी के इन पन्नों में 12 नवंबर 1969 का दिन बेहद ऐतिहासिक है। दरअसल इस दिन कांग्रेस के मजबूत सिडीकेट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया था। ऐसे में इंदिरा गांधी पर आरोप लगा था कि उन्होंने पार्टी के अनुशासन को भंग किया है। पार्टी से निकाले जाने पर इंदिरा गांधी ने पार्टी छोड़ने का फैसला कर लिया।

इतना ही नहीं पार्टी के इस फैसले के बाद इंदिरा ने नई कांग्रेस पार्टी भी बनाई। साथ ही उन्होंने इस नई पार्टी को आने वाले समय में असली कांग्रेस भी साबित किया। कांग्रेस पार्टी में इंदिरा के इन्हीं कारणों के चलते उन्हें आयरन लेडी और सियासत की दुनिया की चतुर राजनीतिक के नाम से जाना जाता है।

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इंदिरा गांधी को सिडीकेट पार्टी ने बर्खास्त कर दिया उसके बावजूद इंदिरा गांधी अपने पद पर बनी रही और पद पर रहते हुए ही उन्होंने नई कांग्रेस सरकार का गठन किया। गौरतलब है कि इस सारे खेल की शुरुआत 1 साल पहले हो चुकी थी। कांग्रेस सिडीकेट के सदस्यों ने इंदिरा गांधी को पद से हटाने के लिए नई-नई रणनीतियां बनाना शुरू कर दिया था। इसके तहत वह एक के बाद एक चाले भी चलने लगे थे।

साल 1966 में कांग्रेस ने एकजुटता के साथ इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री चेहरा बनाते हुए उन्हें यह पदभार सौंपा, लेकिन इस दौरान इंदिरा गांधी को राजनीति का ज्यादा अनुभव नहीं था। इसके बाद धीरे-धीरे उन्होंने पार्टी संगठन पर मजबूती पकड़ बनानी शुरू की। साल 1967 के चुनावों तक इंदिरा गांधी पार्टी पर अपनी काफी हद तक पकड़ बना चुकी थी। उन्होंने अपनी सरकार को काफी हद तक अपने नियंत्रण में भी कर लिया था।

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इसके बावजूद भी साल 1968 से 69 के दौरान इंदिरा गांधी को अभी भी पार्टी में गूंगी गुड़िया के नाम से जाना जाता था। ऐसे में सिडीकेट कांग्रेस के सदस्यों ने इंदिरा गांधी को गद्दी से उतारने का फैसला बना लिया। इसके साथ ही उन लोगों ने योजना बनानी की शुरू कर दी। 12 मार्च 1969 को निजलिंगप्पा ने अपनी डायरी में इस बात का जिक्र करते हुए कहा कि मुझे ऐसा नहीं लगता कि इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री पद पर रहने के लिए काबिल है ऐसे में जल्द ही चुनाव हो सकते हैं।

वहीं निजलिंगप्पा ने अपनी डायरी में इस बात का भी जिक्र किया कि 25 मार्च को मोरारजी भाई देसाई ने उनसे प्रधानमंत्री को हटाए जाने की जरूरत पर चर्चा भी की थी। ऐसे में इंदिरा गांधी को जल्द उनसे के पद से हटाया जा सकता है।

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मोरारजी देसाई को वित्तीय पद से हटाने के चलते सिडीकेट कांग्रेस के नेता पहले से इंदिरा गांधी से नाराज थे। ऐसे में इंदिरा गांधी वीवी गिरी को राष्ट्रपति बनाना चाहती थी। तो वहीं पार्टी के सक्रिय नेता नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति ने बनाना चाहते थे। एक ही पार्टी में दो राष्ट्रपति उम्मीदवारों को लेकर अंदरूनी कलह शुरू हो गया था। बगावत के सुर तेज हुए और नीलम संजीव रेड्डी चुनाव हार गई। रेडी की हार से परेशान होकर पार्टी के नेताओं ने कहना शुरू कर दिया कि अगर प्रधानमंत्री ही पार्टी के नेताओं को सपोर्ट नहीं करेंगी तो पार्टी कैसे चलेगी।

ऐसे में पार्टी अध्यक्ष पद पर बैठे निजलिंगप्पा के खिलाफ सिग्नेचर कैंपेन शुरू हुआ। इंदिरा ने भी अलग-अलग राज्यों में जाकर पार्टी के नेताओं को अपने पक्ष में करना शुरू कर दिया। इंदिरा समर्थकों ने कांग्रेस सेशन बुलाने की मांग की ताकि नया प्रेसिडेंट सुना जा सके। पार्टी में बगावत के सुर तेज होते देख पार्टी अध्यक्ष निजलिंगप्पा ने इंदिरा को ओपन लेटर लिखते हुए उन पर इंटरनल डेमोक्रेसी खत्म करने का आरोप लगाया।

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ऐसे में पार्टी अध्यक्ष के खुद पर लगाए गंभीर आरोपों के बाद इंदिरा ने भी निजलिंगप्पा की बैठकों में जाने से मना कर दिया। धीरे-धीरे दोनों के बीच का मनमुटाव बढ़ने लगा और कांग्रेस वर्किंग कमेटी दो गुटों में बट गई। एक प्रधानमंत्री आवास और दूसरी कांग्रेस के जंतर मंतर रोड कार्यालय पर होने लगीं। दोनों जगह अलग-अलग नेताओं के संग बैठक होने लगी। ऐसे में संसदीय दल समिति ने पार्टी के नेताओं से कहा कि वह अपना नेता चुन ले।

इसके बाद इंदिरा गांधी ने दोनों सदनों के सदस्यों की तत्काल बैठक बुलाई, जिसमें कांग्रेस के 429 सांसदों में से 310 सांसदों ने भाग लिया। इंदिरा ने इसी दौरान कांग्रेस को दो गुटों में बांट दिया। इसमें एक गुट इंदिरा की पार्टी का था, जिसका नाम उन्होंने कांग्रेस(R) और और दूसरी पार्टी का नाम कांग्रेस(O) रखा गया। उस दौरान इंदिरा को सीपीआई और डीएमके की मदद से कांग्रेस(O) के अविश्वास प्रस्ताव से पार्टी से निकाल दिया गया। यहां से इंदिरा अपनी एक नई पार्टी कांग्रेस(R) के साथ उभरकर सामने आई।

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