उत्तर प्रदेश का 25 साल का डॉन, जिसने सीएम की ही ले ली थी सुपारी

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श्रीप्रकाश शुक्ला

90 के दशक का वह नाम जिससे यूपी के लोग कांपते थे, गोरखपुर का वह शार्प – शूटर जिससे अपराधी और पुलिस भी डर से खौफ खाती थी, आखिर कौन है वो डॉन जिसे पकड़ने के लिए ही एसटीएफ का गठन हुआ था। ये कहानी किसी फिल्म से कम नही है, पर यह कोई फिल्मी कहानी नही हकीकत है। श्रीप्रकाश शुक्ला के नाम से उत्तर प्रदेश अनजान नही है, यही वो नाम है जिससे 90 के दशक में लोग काँपते थे, उस दौर में श्रीप्रकाश शुक्ला के पास Ak-47 थी। इन्हें पकड़ने के लिए एसटीएफ का गठन हुआ था।

लोगों में था नाम का खौफ

श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के एक गाँव मे हुआ था, उनके पिता स्कूल में अध्यापक थे। साल 1993 में उनकी बहन को देख कर किसी ने कुछ टिप्पणी कर दी थी और इसी बात पर श्री प्रकाश शुक्ला ने उस शख्स को बीच बाजार गोली मार दी थी, श्रीप्रकाश की उम्र उस वक़्त महज 20 वर्ष की थी और यह उनका पहला अपराध था। इस मामले के बाद वे बैंकॉक भाग गए पर पैसों की तंगी की वजह से उन्हें वापस आना पड़ा था। वापस भारत आ कर वो बिहार के सूरजभान गैंग में शामिल हो गए ।

साल 1997 में श्रीप्रकाश ने लखनऊ में बाहुबली राजनेता वीरेंद्र शाही की दिन दहाड़े हत्या कर दी, इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश में श्रीप्रकाश की दहशत कायम हो गई। इतना ही नहीं श्रीप्रकाश शुक्ला ने 13 जून 1998 में पटना के इंदिरा गाँधी अस्पताल के बाहर बिहार सरकार के मंत्री वृज बिहारी प्रसाद को उनके सुरक्षाकर्मियों के सामने ही गोलियों से भून दिया था।

4 मई 1998 में उत्तर प्रदेश के पुलिस के तत्कालीन DIG अजयराज शर्मा ने राज्य पुलिस के ही होनहार 50 जवानों को छांटकर अलग किया और स्पेशल टास्क फोर्स का गठन किया, इस फोर्स को पहला टास्क यही मिला कि श्रीप्रकाश शुक्ला की गिरफ्तारी जिंदा या मुर्दा। इसके बाद श्रीप्रकाश सूबे के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी ले चुके थे, बताया जाता है कि यह सौदा 5 करोड़ में तय किया गया था।

23 सितंबर 1998 को एसटीएफ प्रभारी अरुण कुमार को शीप्रकाश के दिल्ली से गाजियाबाद की तरफ आने की सूचना मिली, इंदिरापुरम के सूनसान इलाके में जैसे ही श्रीप्रकाश की कार दाखिल हुई एसटीएफ ने उन्हें घेर लिया, श्रीप्रकाश शुक्ला को सरेंडर करने को कहा गया, लेकिन जब वे नही माने और फायरिंग शुरू कर दी, तो पुलिस ने भी जवाबी फायरिंग की जिनमे की श्रीप्रकाश शुक्ला मारे गए। उनकी मौत के बाद उनका खौफ भले ही खत्म हो गया हो लेकिन उनके चर्चे आज भी हैं।

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