पितृ पक्ष में मनुष्य को भूलकर भी नहीं करने चाहिए ये काम, खुशियों में लग जाता है ग्रहण

0
1547
pitru paksha 2019

हिंदू धर्म में पितृपक्ष के दौरान पितरों की पूजा और पिंडदान का विशेष महत्व है। इस साल 13 सितंबर से लेकर 28 सितंबर तक पितृपक्ष है। पितृ पक्ष में 16 श्राद्ध होते हैं और पितरों को खुश किया जाता है। इस दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए पूजा की जाती है। पितृपक्ष में अपने पूर्वजों को पिंडदान और तर्पण दिया जाता है। इसलिए इस पूजा को विधिपूर्वक करना चाहिए। इन दिनों में भूलकर भी कुछ गलतियां नहीं करनी चाहिए, वरना खुशियों में ग्रहण लग सकता है।

धार्मिक मान्यता है कि पिंडदान की पूजा में किसी तरह की लापरवाही करने से आपके पितरों की आत्मा आपसे नाराज या अशांत हो सकती है। इसलिए इसको करते समय कुछ बातों का खास ध्यान रखना चाहिए। आज हम आपको पितृपक्ष के दौरान ध्यान रखने वाली कुछ विशेष बातों के बारे में बताएंगे जिससे आपकी पूजा पूरे विधिविधान से बिना किसी गलती के संपन्न हो सके। और आप बिना किसी गलती के पितरो का आशीर्वाद प्राप्त कर सके।

ज्योतिष के अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष श्राद्धपक्ष या पितृ पक्ष कहलाता है। इस दौरान मृत्यु प्राप्त व्यक्तिों की मृत्यु तिथियों के अनुसार इस पक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध दो प्रकार के होते हैं। पार्वण श्राद्ध और एकोदिष्ट श्राद्ध। आश्विन कृष्ण के पितृपक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है। पार्वण श्राद्ध अपहारण में मृत्यु तिथि के दिन किया जाता है। एकोदिष्ट श्राद्ध हमेशा मध्याह्न में किया जाता है।

पूर्वजों को श्रद्धासुमन अर्पित करने का महापर्व है पितृपक्ष का श्राद्ध, जो श्रद्धा से किया जाए उसे श्राद्ध कहा जाता है। पितृपक्ष के दौरान पितरों के आत्मा की शांति की लिए पिंडदान और तर्पण किया जाता है। धार्मिक मान्यतानुसार, पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पूजा की जाती है। मान्यतानुसार पितृपक्ष में पितरों की पूजा न करने से पूर्वजों को मृत्युलोक में जगह नहीं मिलती है और उनकी आत्मा भटकती रहती है। इस वजह से इस दौरान खासतौर से विधि पूर्वक पितृपक्ष के दौरान पूजा करते हुए तर्पण और पिंडदान करना चाहिए।

आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से अमावस्या तक के समय को श्राद्ध कहते हैं। धर्मशास्त्र कहते हैं कि पितरों को पिंडदान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, यश को प्राप्त करने वाला होता है। पितरों की कृपा से सब प्रकार की समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पितृपक्ष में पितरों को आस रहती है कि हमारे पुत्र पौत्र पिंड दान करके हमें संतुष्ट कर देंगे। इसी आस से पितृलोक से पितर पृथ्वी पर आते हैं। मृत्युतिथि के दिन किए श्राद्ध को पार्वण श्राद्ध कहा जाता है।

पिंडदान का समय

13 सितंबर दिन शुक्रवार को सुबह सात बजकर 34 मिनट पर चतुर्दशी तिथि की समाप्ति है। सात बजकर 35 मिनट पर पूर्णिमा का प्रारंभ होगा, जो कि 14 सितंबर दिन शनिवार को सुबह 10 बजकर 02 मिनट पर समाप्त हो जाएगा। श्राद्ध तर्पण पिंडदान का समय दोपहर का होता है, इसलिए पूर्णिमा 13 सितंबर दिन शुक्रवार को होगी।

भूलकर भी न करें ये काम

श्राद्ध पक्ष में अगर कोई भोजन पानी मांगने आए तो उसे खाली हाथ नहीं जाने दें। मान्यता है कि पितर किसी भी रूप में अपने परिजनों के बीच में आते हैं और उनसे अन्न पानी की चाहत रखते हैं। गाय, कुत्ता, बिल्ली, कौआ इन्हें श्राद्ध पक्ष में मारना नहीं चाहिए, बल्कि इन्हें खाना देना चाहिए।

पितृपक्ष में अपने पूर्वजों की आत्मा की शुद्धि के लिए पूजा की जाती है, यह समय उन्हें याद करने का और पितरों के लिए शोक मनाने का होता है एकतरह से शोकाकुल माहौल होता है। इसलिए धार्मिक मान्यता है कि इस समय कोई शुभ कार्य सम्‍पन्न नहीं किए जाते हैं और घर में किसी तरह की कोई नई वस्तु की खरीदारी करना भी अशुभ माना गया है।

मांसाहारी भोजन जैसे मांस, मछली, अंडा के सेवन से परहेज करना चाहिए। शराब और नशीली चीजों से बचें। परिवार में आपसी कलह से बचें। ब्रह्मचर्य का पालन करें, इन दिनों स्त्री पुरुष संबंध से बचना चाहिए। नाखून, बाल एवं दाढ़ी मूंछ नहीं बनाना चाहिए। क्योंकि श्राद्ध पक्ष पितरों को याद करने का समय होता है।

पितृपक्ष के दौरान दरवाजे पर आने वाले भिखारी या किसी अन्य व्यक्ति को बिना भोजन कराए न जाने दें। इसके साथ ही साथ घर के छत पे पक्षी और पशु पक्षियों के लिए खाना रखें। माना जाता है कि इस दौरान पूर्वज किसी भी रूप में आपके घर पधार सकते हैं।

यह एक तरह से शोक व्यक्त करने का तरीका है। पितृपक्ष के दौरान जो भी भोजन बनाएं उसमें से एक हिस्सा पितरों के नाम से निकालकर गाय या कुत्ते को खिला दें। भौतिक सुख के साधन जैसे स्वर्ण आभूषण, नए वस्त्र, वाहन इन दिनों खरीदना अच्छा नहीं माना गया है, क्योंकि यह शोक काल होता है।

पुरुष रखें ये खास ध्यान

जो पुरुष इस दौरान अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं उन्हें विशेष रूप से इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि इस दौरान उन्हें अपनी दाढ़ी नहीं बनवानी है और न ही बाल कटवाने हैं। शास्त्रों में भी इस बात का उल्लेख है कि इन पंद्रह दिनों में बाल कटवाने और दाढ़ी बनवाने से धन की हानि हो सकती है।

पितृपक्ष के दौरान घर पर ही बनाए गए सात्विक भोजन से अपने पितरों को भोग लगाना चाहिए। यदि आपको अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि याद है तो ध्यान रखते हुए उस दिन ही पिंडदान कर सकते हैं, नहीं तो फिर पितृपक्ष के आखिरी दिन भी पिंडदान अथवा तर्पण की विधि से पूजा संपन्न करनी चाहिए।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here