राम मंदिर: 70 साल पहले नहीं माना नेहरू का आदेश, फिर बना हिंदुत्व का चेहरा और पहुंचा लोकसभा

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Interesting Story Of Dm kk Nayar

देश के सबसे पुराने अयोध्‍या विवाद पर ऐतिहासिक फैसले का इंतजार अब पूरी तरह ख़त्म हो चूका है। देश की सर्वोच्च अदालत ने अयोध्या विवाद पर अपना फैसला सूना दिया है। मुख्य न्‍यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता में गठित पांच सदस्य बाली संविधान पीठ ने अपने फैसले में विवादित 2.77 एकड़ जमीन का फैसला राम मंदिर के पक्ष में सुनाया। वंही मुश्लिम पक्ष की भावनाओ को ध्यान में रखते हुए अलग (वैकल्पिक) 5 एकड़ जमीन आवंटित करने का फैसला सुनाया।

देश की सर्वोच्च अदालत के द्वारा सुनाया गया फैसला दोनों पक्षों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया, वंही पुरे देश के जनमानस ने कोर्ट के फैसले का दिल खोल कर स्वागत किया। फैसले के बाद, पुरे देश ने एक स्वर में हिन्दू मुश्लिम एकता के साथ भाई चारे की मिशाल पेश की। ये बात तो आप सभी लोग जानते ही होंगे, की राम मंदिर मुद्दा देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना जिसका फैसला 9 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि राम जन्‍मभूमि के विवाद को यहां तक पहुंचाने वाला कौन है। तो आइये आपको बताते है…थोड़ा विस्तार से।

नौकरी दांव पर लगा नहीं माना आदेश

वैसे तो लालकृष्‍ण आडवाणी से लेकर कई राजनेता, समाजसेवी और नौकरशाह इस सूची में शामिल हैं लेकिन केके नायर एक ऐसे नौकरशाह हैं जिन्‍होंने रामलला की मूर्ति को विवादित भूमि से हटने नहीं दिया। यहां तक की उन्‍होंने डीएम तक की नौकरी भी दांव पर लगा दी थी।

दरअसल, अयोध्या के विवादित स्थल पर रखी गईं रामलला की मूर्तियों को हटवाने के लिए तत्‍कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दो बार आदेश दिए लेकिन अयोध्या के डीएम ने दोनों बार उनके आदेश का पालन करवाने में असमर्थता जताकर बड़े हिंदूवादी चेहरे के रूप में अपनी पहचान बनाई। डीएम और उनकी पत्नी ने बाद में चुनाव लड़ा और दोनों लोकसभा पहुंचे जबकि उनका ड्राइवर भी इस इमेज का फायदा उठाकर यूपी विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहा।

जब मूर्तियां रखी गईं…

वर्ष 1949 में 22 और 23 दिसंबर की आधी रात मस्जिद (Masjid) के अंदर कथित तौर पर चोरी-छिपे रामलला की मूर्तियां रख दी गईं। अयोध्या में शोर मच गया कि जन्मभूमि में भगवान प्रकट हुए हैं। मौके पर तैनात कांस्टेबल के हवाले से लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट में लिखा गया है कि इस घटना की सूचना कांस्टेबल माता प्रसाद ने थाना इंचार्ज राम दुबे को दी।

उसके बाद 50-60 लोगों का एक समूह परिसर का ताला तोड़कर दीवारों और सीढ़ियों को फांदकर अंदर घुस आया और श्रीराम की प्रतिमा स्थापित कर दी। साथ ही उन्होंने पीले और गेरुआ रंग में श्रीराम लिख दिया। इस बारे में हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ नामक अपनी किताब में मूर्ति से जुड़ी एक दिलचस्प घटना का जिक्र किया है।

उनके मुताबिक केरल के अलेप्पी के रहने वाले केके नायर 1930 बैच के आईसीएस अफसर थे। फैजाबाद के जिलाधिकारी रहते इन्हीं के कार्यकाल में बाबरी ढांचे में मूर्तियां रखी गईं या यूं कहें इन्होंने ही रखवाई थीं। पुजारियों, भक्तों और कई स्थानीय समूहों में इसे लेकर खुशी मनाई गई। कुछ दिन बाद अयोध्या और विशेष रूप से संयुक्त प्रांत यानी उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक तनाव पैदा हो गया। उस समय कांग्रेस के दिग्गज नेता गोविंद बल्लभ पंत संयुक्त राज्य के मुख्यमंत्री थे।

पीएम नेहरू का आदेश मानने से कर दिया इनकार

तत्‍कालीन डीएम केके नायर बाबरी मामले से जुड़े आधुनिक भारत के वे ऐसे शख्स हैं जिनके कार्यकाल में इस मामले में सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट आया और देश के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने पर इसका दूरगामी असर पड़ा। केके नायर एक जून, 1949 को फैजाबाद के कलेक्टर बने। 23 दिसंबर, 1949 को जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में स्थापित हुईं तो तत्‍कालीन पीएम जवाहरलाल नेहरू ने यूपी के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से फौरन मूर्तियां हटवाने को कहा।

उत्तर प्रदेश सरकार ने मूर्तियां हटवाने का आदेश दिया, लेकिन जिला मजिस्ट्रेट केके नायर ने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई।’ शर्मा लिखते हैं, ‘जब नेहरू ने दोबारा मूर्तियां हटाने को कहा तो नायर ने सरकार को लिखा कि मूर्तियां हटाने से पहले मुझे हटाया जाए। देश के सांप्रदायिक माहौल को देखते हुए सरकार पीछे हट गई।

अयोध्या मामले को लेकर नेहरू ने पंत को लिखा पत्र …

तीन दिन बाद 26 दिसंबर को पंडित नेहरू ने अयोध्या विवाद पर जीबी पंत को एक टेलीग्राम भेजा। इसमें उन्होंने लिखा, मैं अयोध्या के घटनाक्रम से परेशान हूं। उम्मीद है कि आप व्यक्तिगत रूप से इस मामले को हल करने में रुचि लेंगे। कुछ मीडिया रिपोर्टों में कथित तौर पर कहा गया कि नेहरू ने राज्य सरकार को रामलला और सीता की मूर्तियों को बाबरी मस्जिद परिसर से बाहर स्थानांतरित करने का निर्देश देने वाला एक नोट भी लिखा था।

नेहरू ने भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल सी राजगोपालाचारी को लिखे अपने पत्र में अपनी यह चिंता दोहराई। नेहरू ने गवर्नर जनरल को बताया कि मैंने कल रात अयोध्या के बारे में पंत जी को लिखा है। पंत जी ने मुझे बाद में फोन भी किया। उन्होंने कहा कि वे बहुत चिंतित थे और व्यक्तिगत रूप से इस मामले को देख रहे हैं।

नेहरू ने अयोध्या विवाद के लिए डीएम को दोषी ठहराया था…

पंडित नेहरू का एक और पत्र जो कि दिनांक 5 मार्च, 1950 को फैजाबाद जिला प्रशासन को भेजा गया था, उसमें नेहरू ने कहा कि डीएम अपनी ड्यूटी ठीक तरह से नहीं कर रहे हैं। उस दौरान डीएम केके नायर, आईसीएस ने स्पष्ट रूप से नेहरू के निर्देश का पालन करने से इनकार कर दिया था। नेहरू ने अपने पत्र में लिखा, आप अयोध्या मस्जिद का जिक्र करते हैं। यह घटना दो या तीन महीने पहले घटी थी। मुझे इसका बहुत दुख हुआ है।

एक डीएम ने गलत व्यवहार किया और राज्य सरकार ने इसे रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। दूसरी ओर, नायर ने राज्य सरकार के माध्यम से तत्कालीन प्रधानमंत्री के निर्देश पर स्पष्ट रूप से काम नहीं करने की बात कह दी। तत्कालीन यूपी के मुख्य सचिव को भेजे एक पत्र में नायर ने लिखा, अगर सरकार ने किसी भी कीमत पर मूर्तियों को हटाने का फैसला किया है तो मेरा अनुरोध है कि उससे पहले मुझे वहां से हटा दिया जाए। किसी दूसरे डीएम को वहां लगा दिया जाए।

नायर ने यह भी दावा किया कि विवादित स्थल से मूर्तियों को हटाने से जनता को व्यापक पीड़ा होगी, जिसके परिणामस्वरूप कई लोगों की जान जा सकती है। इस पृष्ठभूमि के खिलाफ नेहरू ने जीबी पंत को एक और पत्र भेजा। इसमें उन्होंने लिखा, वे अयोध्या जाने के लिए तैयार हैं। पांच फरवरी, 1950 को नेहरू ने पंत को कहा, अयोध्या विवाद का कश्मीर मुद्दे सहित शेष भारत पर असर पड़ सकता है। मुझे खुशी होगी अगर आप अयोध्या की स्थिति से लगातार अवगत कराते रहेंगे। यदि आवश्यक हो तो मैं अयोध्या जाऊंगा।

नेहरू ने लिखा, यदि आपको लगता है कि मेरा आना जरुरी है तो मैं तारीख तय करने का प्रयास करूंगा, हालांकि मैं बहुत व्यस्त हूं। उनकी यह यात्रा कभी नहीं हो सकी। अयोध्या में सांप्रदायिक तनाव को शांत करने के लिए बाबरी मस्जिद के द्वार बंद कर दिए गए थे। जनता का प्रवेश वर्जित था। एक पुजारी को वर्ष में एक बार राम लल्ला और सीता की मूर्तियों की पूजा करने की अनुमति थी।

पति-पत्नी दोनों बने सांसद

डीएम नायर ने 1952 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) ले ली। चौथी लोकसभा के लिए वो उत्तर प्रदेश की बहराइच सीट से जनसंघ के टिकट पर लोकसभा पहुंचे। इस इलाके में नायर हिंदुत्व के इतने बड़े प्रतीक बन गए कि उनकी पत्नी शकुंतला नायर भी कैसरगंज से तीन बार जनसंघ के टिकट पर लोकसभा पहुंचीं। बाद में उनका ड्राइवर भी उत्तर प्रदेश विधानसभा का सदस्य बना।’

विवादित स्थल से मूर्तियां न हटाए जाने के खिलाफ मुसलमानों में तीखी प्रतिक्रिया हुई। उन्होंने इसका विरोध किया। दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया। फिर सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित कर के ताला लगा दिया। जिसके बाद कई वर्षो तक केस अदालत में चलता रहा। इसी बीच रथ यात्रा से बाबरी विध्वंस भी हुआ। जिसके बाद मामला और पेचीदा हो चला। तय समय सीमा के बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले पर सुनबाई की। जिसके फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गयी। और अंत में 9 नवंबर 2019 को माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने इस पर अपना फैसला सुना दिया। धन्यवाद।

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