गोबर के उपले बनाकर बेचने बाली लड़की ने खड़ा किया 700 करोड़ का साम्राज्य, पूरे 8 कंपनियों की हैं मालकिन

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हौसले बुलंद हों तो बंजर जमीन को भी गुलजार किया जा सकता है, जिंदगी में कई ऐसे मौके आते हैं, जब इंसान को लगता है कि सब खत्म हो गया है। हमें समझ नहीं आता कि अब आगे कैसे बढ़ा जाए। ऐसे समय में कुछ लोगों की कहानियां हमें प्रेरित करती हैं और आगे बढ़ने का हौसला देती हैं। आज हम आपको कुछ ऐसी ही एक महिला की कहानी बताने जा रहे है, जिन्होंने अपने दम पर सपनो को पूरा करने का नया आयाम लिखा।

नाम- कल्पना सरोज। एक गरीब दलित लड़की, महाराष्ट्र के ‘विदर्भ’ में पैदा हुईं। जिसने पति की यातनाएं सही, समाज के ताने झेले और इन सब से तंग आकर खुदकुशी की भी कोशिश की। लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।

कल्पना सरोज की कहानी, जिन्होंने जिंदगी का वो दौर देखा है जिसकी शायद हम और आप कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन वे आज 700 करोड़ की कंपनी की मालकिन हैं। कल्पना करोड़ों का टर्नओवर देने वाली कंपनी की चेयरपर्सन और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हैं। इसके अलावा कल्पना सरोज कमानी स्टील्स, केएस क्रिएशंस, कल्पना बिल्डर एंड डेवलपर्स, कल्पना एसोसिएट्स जैसी दर्जनों कंपनियों की मालकिन हैं। आखिर कैसे मिली उन्हें सफलता? पढ़ते हैं इनके बारे में सबकुछ…

एक समय में उनके घर के हालात इतने खराब थे कि कल्पना गोबर के उपले बनाकर बेचा करती थीं। मगर उन्होंने हार नहीं मानी और अपनी मेहनत से खुद का भाग्य बदल दिया। आज वो न सिर्फ करोड़पति हैं, बल्कि दूसरों के लिए प्रेरणा भी हैं।

महज 10 साल की उम्र में शादी का बोझ

कल्पना का जीवन बचपन से ही संघर्ष भरा रहा। वह महज 10 साल की थी, जब उनकी शादी कर दी गई। ससुराल आकर न सिर्फ उनकी पढ़ाई रुक गई, बल्कि उन्हें ससुराल में घरेलू हिंसा का शिकार भी होना पड़ा।

ससुराल में घरेलू कामकाज में जरा सी चूक पर कल्पना रोज पिटती। शरीर पर जख्म पड़ चुके थे और जीने की ताकत खत्म हो चुकी थी। एक समय ऐसा भी आया, जब उन्होंने हार मानकर आत्महत्या करने की कोशिश की थी। हालांकि, एक रिश्तेदार की मदद से उन्हें बचा लिया गया।

कल्पना बताती हैं कि जान देने की कोशिश उसकी जिंदगी में एक बड़ा मोड़ लेकर आई।

‘मैंने सोचा कि मैं क्यों जान दे रही हूं, किसके लिए? क्यों न मैं अपने लिए जिऊं, कुछ बड़ा पाने की सोचूं, कम से कम कोशिश तो कर ही सकती हूं।’

2 रु की दैनिक मजदूरी पर शुरू किया था काम

16 साल की उम्र में कल्पना फिर मुंबई लौट आई। लेकिन इस बार पिटने के लिए नहीं एक नई जिंदगी शुरू करने के लिए। मुंबई पहुंची कल्पना को हुनर के नाम पर कपड़े सिलने आते थे और उसी के बल पर उसने एक गारमेंट कंपनी में नौकरी कर ली। यहां एक दिन में उन्हें 2 रुपए की मजदूरी मिलती थी। इस तरह वो धीरे-धीरे आगे बढ़ीं और फिर 50,000 का सरकारी लोन लेकर एक बुटीक शॉप खोल ली।

कल्पना ने निजी तौर पर ब्लाउज सिलने का काम शरू किया। एक ब्लाउज के 10 रुपए मिलते थे। इसी दौरान कल्पना की बीमार बहन की इलाज न मिलने के चलते मौत हो गई। कल्पना बुरी तरह टूट गई। उन्होंने सोचा कि अगर रोज चार ब्लाउज सिले तो 40 रुपए मिलेंगे और घर की मदद भी होगी। उसने ज्यादा मेहनत की, दिन में 16 घंटे काम करके कल्पना ने पैसे जोड़े और घरवालों की मदद की।

उन्होंने दलितों को मिलने वाला 50,000 का सरकारी लोन लेकर एक सिलाई मशीन और कुछ अन्य सामान खरीदा और एक बुटीक शॉप खोल ली। दिन रात की मेहनत से बुटीक शॉप चल निकली तो कल्पना ने बचत के पैसों से एक फर्नीचर स्टोर भी स्थापित किया जिससे उसे काफी अच्छा रिस्पॉन्स मिला। इसी के साथ उसने ब्यूटी पार्लर भी खोला और साथ रहने वाली लड़कियों को काम भी सिखाया।

अब 1-2 नहीं 8 कंपनियों की हैं मालकिन

उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निग प्वाइंट वो रहा, जब उन्हें सालों से बंद पड़ी ‘कमानी ट्यूब्स’ को चलाने का मौका मिला। कल्पना के संघर्ष और मेहनत को जानने वाले उसके मुरीद हो गए और मुंबई में उन्हें पहचान मिलने लगी। इसी जान-पहचान के बल पर कल्पना को पता चला कि 17 साल से बंद पड़ी ‘कमानी ट्यूब्स’ को सुप्रीम कोर्ट ने उसके कामगारों से शुरू करने को कहा है।

कंपनी के कामगार कल्पना से मिले और कंपनी को फिर से शुरू करने में मदद की अपील की। ये कंपनी कई विवादों के चलते 1988 से बंद पड़ी थी। फिर क्या था, सालो से बंद पड़ी इस कंपनी को कल्पना वर्करों के साथ मिलकर तरक्की के रास्ते पर लेकर गईं।

कल्पना ने जब कंपनी संभाली तो कंपनी के वर्करों को कई साल से सैलरी नहीं मिली थी, कंपनी पर करोड़ों का सरकारी कर्जा था, कंपनी की जमीन पर किराएदार कब्जा करके बैठे थे, मशीनों के कलपुर्जे या तो जंग खा चुके थे या चोरी हो चुके थे, मालिकाना और लीगल विवाद थे।

कल्पना ने हिम्मत नहीं हारी और दिन रात मेहनत करके ये सभी विवाद सुलझाए और महाराष्ट्र के वाडा में नई जमीन पर फिर से सफलता की इबारत लिख डाली। कल्पना की मेहनत का कमाल है कि आज ‘कमानी ट्यूब्स’ करोड़ों का टर्नओवर दे रही है। वर्करों के सहयोग और सीखने की ललक ने आज एक दिवालिया हो चुकी कंपनी को सफल बना दिया।

आज कल्पना सरोज कमानी स्टील्स, केएस क्रिएशंस, कल्पना बिल्डर एंड डेवलपर्स, कल्पना एसोसिएट्स जैसी दर्जनों कंपनियों की मालकिन हैं।

सरकार ने नबाजा पद्मश्री

समाजसेवा और उद्यमिता के लिए कल्पना को पद्मश्री और राजीव गांधी रत्न के अलावा देश-विदेश में दर्जनों पुरस्कार मिल चुके हैं। कभी दो रुपए रोज कमाने वाली कल्पना आज 700 करोड़ के साम्राज्य पर राज कर रही हैं।

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