इस चैत्र नवरात्रि में जरूर करें इन 6 देवी धामों के दर्शन, यहां मां अम्बे की बरसती है अपार कृपा

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Chaitra Navratri Mata Rani Famous Temple in India

शरद नवरात्रि (Navratri 2018) शुरू हो चुकी है। पूरी दुनिया में धूमधाम से मां दुर्गा का पर्व मनाया जा रहा है। यह 10 अक्टूबर से लेकर 18 अक्टूबर तक चलेंगे। 9 दिनों तक पूरे विधि विधान से मां दुर्गा की पूजा की जाती है। कुछ भक्त नवरात्रि के पूरे नौ दिनों तक व्रत रखते हैं तो कुछ पहला और आखिरी व्रत रख दुर्गा मां के प्रति अपना प्रेम उजागर करते हैं।

मां की आराधना के लिए किसी दिन विशेष की जरूरत तो नहीं होती बस श्रद्धा चाहिए लेकिन नवरात्र को बेहद खास माना गया है। चाहे वासंतिक हो या शारदीय। इन दिनों में मां की पूजा और दर्शन से विशेष फल मिलता है। ऐसे में अगर आप मां के किसी मंदिर में दर्शन के लिए जाना चाहते हैं तो आइए यहां हम बताते हैं आपको कुछ प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में, जहां मां की अपार कृपा बरसती है और नवरात्र में भक्‍तों का तांता लगा रहता है।

हिन्दुओं के लिए नवरात्रि का बहुत महत्व हैं ऐसा माना जाता है कि इस दौरान देवी दुर्गा अपने भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए स्वर्ग से आती हैं। नवरात्रि के दौरान भारत के अलग-अलग कोनों में फैले हुए मां के प्रसिद्ध मंदिरों में भारी संख्‍या में भक्‍तों का जमावाड़ा लगता है। आइए जानते हैं वैष्णों देवी के अलावा मां दुर्गा के 7 मंदिर जो बहुत प्रसिद्ध हैं।

दक्षिणेश्‍वर काली मंदिर, कोलकाता

कोलकाता में हुगली नदी के किनारे स्थित यह मंदिर भक्‍तों की अगाध श्रद्धा का केंद्र है। इस मंदिर की स्‍थापना के बारे में कहा जाता है कि जान बाजार की जमींदार रानी रासमणि को मां काली ने स्‍वप्‍न में दर्शन दिया साथ ही मंदिर निर्माण कराए जाने का भी निर्देश दिया।

कोलकाता में हुगली नदी के किनारे स्थित यह मंदिर भक्‍तों की अगाध श्रद्धा का केंद्र है। इस मंदिर की स्‍थापना के बारे में कहा जाता है कि जान बाजार की जमींदार रानी रासमणि को मां काली ने स्‍वप्‍न में दर्शन दिया साथ ही मंदिर निर्माण कराए जाने का भी निर्देश दिया। इसके बाद 1847 में दक्षिणेश्‍वर मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। यह मंदिर स्‍वामी रामकृष्‍ण परमहंस की कर्मभूमि भी रही है।

करणी माता मंदिर, राजस्थान

हमारे देश में अनेक प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां बार-बार जाने का मन करता है। एक ऐसा ही मंदिर राजस्थान के बीकानेर से लगभग 30 किलोमीटर दूर जोधपुर रोड पर गांव देशनोक की सीमा में स्थित है। यह है मां करणी देवी का विख्यात मंदिर। यह भी एक तीरथ धाम है, लेकिन इसे चूहे वाले मंदिर के नाम से भी देश और दुनिया के लोग जानते हैं।

इस मंदिर को चूहों का मंदिर भी कहा जाता है। आपने कई बार इस मंदिर के बारे में टीवी में सुना और देखा होगा। इस मंदिर में करीब 20 हज़ार के आस-पास चूहे रहते हैं। चूहों के अलावा यहां करणी माता की प्रतिमा स्थापित है। इन्हें मां जगदम्बा का अवतार माना जाता है।

वैष्णो देवी मंदिर, जम्मू

हिन्दू धर्म में वैष्णो देवी धाम एक अहम धाम माना जाता है। यहां देश ही नहीं बल्कि विदेश से भी लोग मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करने आते हैं। जम्मू में स्थित इस देवी धाम पर साल भर भक्तों का मेला लगा रहता है।

जमीन से 5000 फिट की उंचाई पर मौजूद इस धाम के दर्शन के लिए खास नवरात्री पर यहां भक्त आते हैं। पहाड़ पर 13 किलोमीटर का पैदल रास्ता पार करके माता वैष्णों के दर्शन को जाया जाता है। जो भक्त इस रास्ते को पैदल पार नहीं कर पाते वो खच्चर या पालकी से यहां पंहुच सकते हैं।

मनसा देवी, हरिद्वार, उत्तराखंड

मान्यता है कि इस मंदिर में भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं इसीलिए इस मंदिर का नाम मनसा देवी पड़ा। इस मंदिर में मौजूद पेड़ की शाखा पर भक्त पवित्र धागा बांधते हैं। मन्नत पूरी होने के बाद वो भक्त यहां वापस आकर धागे को खोलते हैं।

हरिद्वार में शिवालिक की पहाड़ियों पर स्थित इस मनसा देवी मंदिर में जाकर आप देवी दर्शन के साथ यहां के अच्छे मौसम का भी लुत्फ़ उठा सकते हैं। माना जाता है कि मनसा देवी मंदिर में भक्तों की सभी मनोकामना पूरी होती है। यह मंदिर हिंदू देवी मनसा देवी को समर्पित है जो ऋषी कश्यप के दिमाग की उपज है।

कश्यप ऋषी प्राचीन वैदिक समय में एक महान ऋषी थे। मनसा देवी, सापों के राजा नाग वासुकी की पत्नी हैं। इस मंदिर में भ्रमण के दौरान भक्त एक पवित्र वृक्ष के चारों ओर एक धागा बांधते हैं एवं भगवान से अपनी मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना करते हैं। मनोकामना पूर्ण होने के बाद वृक्ष से इस धागे को खोलना आवश्यक है। पर्यटक इस मंदिर तक केबल कार द्वारा पहुंच सकते हैं। केबल कार यहां ‘देवी उड़नखटोला’ के नाम से प्रसिद्ध है।

पाटन देवी मंदिर, उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के गोंडा से 70 किलोमीटर दूर मौजूद इस मंदिर के बारे में कई पौराणिक मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि आग में समाधि लेने के बाद सटी का दाहिना हाथ इसी जगह पर आकर गिरा था। जिसके बाद से यह जगह मशहूर हो गयी। इस मंदिर का निर्माण महाराजा विक्रमादित्य के समय हुआ था।

देवीपाटन की देवी का एक दूसरा भी प्रसिद्ध नाम तथा इतिवृत्त पातालेश्वरी देवी के रूप में प्राप्त होता है। कहते हैं कि अयोध्या की महारानी सीताजी लोकापवाद से खिन्न होकर अंततः यहीं पर धरती माता की गोद में बैठकर पाताल में समा गईं थीं। इसी पाताल-गामी सुरंग के ऊपर देवीपाटन-पातालेश्वरी देवी का मंदिर बना हुआ है।

इस स्थान पर माता सती का दायां कंधा गिरा था। इसी वजह से यह स्थान 51 शक्तिपीठों में शामिल है। देवी पाटन का दूसरा नाम पातालेश्वरी देवी भी है। मान्यता है कि इसी स्थान पर माता सीता धरती मां की गोद में समाकर पाताल लोक चली गईं। इसीलिए इस स्थान का नाम पावालेश्वरी देवी पड़ा। इस मंदिर को कोई प्रतिमा नहीं है, सिर्फ एक चांदी का चबूतरा है, जिसके नीचे सुरंग ढकी हुई है।

ज्‍वाला देवी (हिमाचल प्रदेश)

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्‍थापित यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। शास्‍त्रों में कहा गया है कि यहां पर माता सती की जीभ गिरी थी। इस मंदिर में मां ज्‍योति के रूप में स्‍थापित हैं। यही वजह है कि इसे ज्‍वाला देवी मंदिर कहा जाता है।

मंदिर में जलने वाली जोत के बारे में कहा जाता है कि यह दिया सदियों से जल रहा है। इसे जलाने के लिए किसी भी तरह के तेल या घी की भी जरूरत नहीं पड़ती। यह प्राकृतिक रूप से जलता रहता है। यहां मांगी गई भक्‍तों की हर मुराद पूरी होती है।

51 शक्तिपीठों में शामिल हिमाचल के इस मंदिर में मां दुर्गा के नौ रूपों की ज्योति जलती रहती है। इन नौ ज्योतियों के नाम हैं महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका और अंजीदेवी। इन सभी माताओं के दर्शन ज्योति रूप में होते हैं। इस मंदिर को जोता वाली का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता है। यहां माता सती की जीभ गिरी थी, इसीलिए यह 51 शक्तिपीठों में शामिल है।

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