धार्मिक शिक्षा: कन्या दान के अलावा विवाह में ‘सिंदूर दान’ भी माना गया है उच्चतम, जाने कारण

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Sindur Dan

हिंदू धर्म की शादियों (Hindu Marriage) में तमाम रस्‍म और रिवाज निभाने के बाद ही विवाह (Marriage) को पूर्ण माना जाता है। तब जाकर कन्‍या (Bride) और वर (Groom) पति-पत्‍नी बन पाते हैं। विवाह की इन रस्‍मों में सबसे महत्‍वपूर्ण होता है कन्‍यादान (kanya Daan) और सिंदूर दान । कन्‍यादान का अर्थ होता है कन्‍या का दान। अर्थात पिता अपनी पुत्री का हाथ वर के हाथ में सौंपता है। इसके बाद से कन्‍या की सारी जिम्‍मेदारियां वर को निभानी होती हैं।

यह एक भावुक संस्‍कार है, जिसमें एक बेटी अपने रूप में अपने पिता के त्‍याग को महसूस करती है। इसी तरह धार्मिक शास्त्रों में सिंदूर दान का महत्व भी बताया गया है। वेदों और पुराणों के अनुसार विवाह में वर को भगवान विष्‍णु का स्‍वरूप माना जाता है। विष्‍णु रूपी वर कन्‍या के पिता की हर बात मानकर उन्‍हें यह आश्‍वासन देता है कि वह उनकी पुत्री को खुश रखेगा और उस पर कभी आंच नहीं आने देगा। इसी तरह वर अग्नि को साक्षी मान पत्नी के साथ सात फेरे लेकर सात बचन देता है, धार्मिक रिबाजो के अनुसार कंही कंही ये 8 बचन भी होते है। तो आइये जानते है, थोड़ा विस्तार से।

कन्या दान का महत्व

शास्‍त्रों में बताया गया है कि जब कन्‍या के पिता शास्‍त्रों में बताए गए विधि-विधान के अनुसार, कन्‍यादान की रस्‍म निभाते हैं तो कन्‍या के माता-पिता और परिवार को भी सौभाग्‍य की प्राप्ति होती है। कन्‍यादान की रस्‍म भी देश के अलग-अलग हिस्‍सों में अलग तरीके से निभाई जाती है। दक्षिण भारत में कन्‍या अपने पिता की हथेली पर अपना हाथ रखती है और वर अपने ससुर की हथेली के नीचे अपना हाथ रखता है। फिर इसके ऊपर जल डाला जाता है। पुत्री की हथेली से होता हुआ जल पिता की हथेली पर जाता है और इसके बाद वर की हथेली पर।

उतर भारत के कई स्‍थानों पर वधू की हथेली को एक कलश के ऊपर रखा जाता है। फिर वर वधू की हथेली पर अपना हाथ रखता है। फिर उस पर पुष्‍प, गंगाजल और पान के पत्ते रखकर मंत्रोच्‍चार किए जाते हैं। इसके बाद पवित्र वस्‍त्र से वर-वधू का गठबंधन किया जाता है। इसके बाद सात फेरों की रस्‍में निभाई जाती है। कन्‍यादान को सबसे बड़ा दान माना जाता है। ऐसा माना गया है कि जिन माता-पिता को कन्‍यादान का सौभाग्‍य प्राप्‍त होता है, उनके लिए इससे बड़ा पुण्‍य कुछ नहीं है। यह दान उनके लिए मोक्ष की प्राप्ति मरणोपरांत स्‍वर्ग का रास्‍ता भी खोल देता है।

ऐसे हुई कन्यादान की शुरुआत

पौराणिक कथाओं के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी कन्याओं का विवाह करने के बाद कन्यादान किया था। 27 नक्षत्रों को प्रजापति की पुत्री कहा गया है जिनका विवाह चंद्रमा से हुआ था। इन्होंने ही सबसे पहले अपनी कन्याओं को चंद्रमा को सौंपा था ताकि सृष्टि का संचालन आगे बढ़े और संस्कृति का विकास हो। इन्हीं की पुत्री देवी सती भी थीं जिनका विवाह भगवान शिव से हुआ था।

‘सिंदूर दान’ पौराणिक कथा

हिन्दू विवाह प्रणाली के अनुसार, शादी की सभी रस्मे तब तक अधूरी समझी जाती है, जब तक वर, वधु की मांग में सिंदूर ना भर दे। इस विधि को लेकर हिन्दू धार्मिक पुराण रामायण में एक प्रशंग भी विज्ञाप्त है। माना जाता है, कि इसी प्रशंग के आधार पर हिन्दू विवाह में ‘सिंदूर दान’ की रीत निभाई जाती है। रामायण के अनुसार, भगवान श्रीराम ने राजा जनक द्वारा आयोजित किए गए स्वयंवर में शिव के धनुष को तोड़कर सीता को प्राप्त किया और सीता जी ने श्रीराम जी के गले में वरमाला डालकर उन्हें पति रूप में स्वीकार किया।

तदोपरांत राजा जनक ने अयोध्या के राजा दशरथ को संदेश भेजा। तब वह अयोध्या से बारात लेकर जनकपुरी गए। तब फिर दोनों पक्षों की उपस्थिति में वैदिक रीति से ब्राह्मणों द्वारा मंत्रोच्चारण के मध्य विधिपूर्वक श्रीराम ने सीता की मांग में सिंदूर भरा जिसे ‘सिंदूर दान’ कहते हैं। माना जाता है सिंदूर दान के पश्चात ही विवाह की पूर्णता होती है। रामायण के इसी प्रशंग को रिवाज मानकर हिन्दू विवाह में वर, वधु की मांग में सिंदूर भरता है।

‘सिंदूर दान’ का महत्व

महिलाओं में माथे पर कुमकुम (बिंदी) लगाने के अतिरिक्त मांग में सिंदूर लगाने की प्रथा अति प्राचीन है। यह उनके सुहागिन होने का प्रतीक तो है ही, साथ ही इसे मंगलसूचक भी माना जाता है।ज्योतिष शास्त्र में लाल रंग को काफी महत्व दिया गया है, क्योंकि यह मंगल ग्रह का प्रतीक है। सिंदूर का रंग भी लाल ही होता है। अत: इसे मंगलकारी माना जाता है। शास्त्रों में इसे लक्ष्मी का प्रतीक भी कहा गया है।

स्त्रियों द्वारा मांग में सिंदूर भरने का प्रारंभ विवाह संस्कार के पश्चात् ही होता है। विवाह के समय प्रत्येक वर अपनी वधू की मांग में सिंदूर भरता है। विवाह के मध्य सम्पन्न होने वाला यह एक प्रमुख संस्कार है। पति की मृत्यु हो जाने पर वे मांग भरना बंद कर देती हैं। वास्तव में स्त्रियां अपनी मांग में जिस स्थान पर सिंदूर भरती हैं, स्त्री के शरीर का यह स्थान पुरुष के शरीर के इस स्थान की अपेक्षा बहुत अधिक संवेदनशील होता है, जिसकी रक्षा करना आवश्यक है।

सिंदूर का वैज्ञानिक महत्व

सुहागिन स्त्रियां शादी के पश्चात वैवाहिक जीवन की पद्द्ति के अनुसार मांग में सिंदूर लगाती है। इसको लेकर कई तरह वैज्ञानिक और धार्मिक महत्व किताबो व धर्म शास्त्रों में उल्ल्खनीय है। वैज्ञानिक आधार पर देखे, तो यह स्पष्ट होता है कि सिंदूर जिन पदार्थों के मिश्रण से बनता है, उनमें अन्य चीजों के अलावा पारा जैसी धातु काफी मात्रा में होती है। सिंदूर में उपस्थित पारा इसका उपयोग करने वाली महिला के शरीर में न केवल वैद्युतिक उत्तेजना को नियंत्रित रखता है, बल्कि मर्म स्थान को बाहरी दुष्प्रभावों से भी सुरक्षित करता है।

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